किसी को तो हो इल्म कि आखिर मुझे क्या चाहिए ? by Aman Kumar Verma

 

बाल मजदूरी – यह उनका कोई शौक नहीं है । मजदूरी करना उनकी मजबूरी है । उनके मन में भी कई ख्वाब मूर्त रूप तो लेता है, लेकिन उनके वो ख्वाब जमीं पर मूर्त रूप लेने से पहले ही भस्म हो जाता है । उनके उस ख्वाब को जमींदोज हो जाने के पीछे कारखाने के उस मालिक से ज्यादा जिम्मेदार वो सभ्य आम आदमी है जो ये सब देखकर भी अनजान बना रहता है ।

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