अपने : A dialogue between a mother and daughter by Aman Kumar Verma

अपने

हाँ, आज मैं गुमसुम हूँ, नाराज हूँ, हतास हूँ, निरास हूँ … हाँ, नाराज हूँ… नाराज हूँ तूमसे, तुम सब से ।

अब पूछोगे तुम – “नाराज हो… हमसे भी… पर क्यूँ ? ”
पर क्या जबाब दूं … कितनी बार जबाब दूं … और हाँ, अब ये जबाब मैं तुम्हें क्यों दूं …? कितनी बार तो दे चुकी थी… क्या अब तक ना सुनी थी कभी कोई मेरी मखमली आवाज …? एक बार सून तो लेती कि क्या कह रही हूँ मैं… सून तो लेती कि कितना दर्द समेटे जी रही हूँ मैं… सून तो लेती कि हर रोज कितनी बार मर रही होती हूँ मैं… मार खा रही होती हूँ मैं… यौन शोषण का शिकार हो रही होती हूँ मैं… एक बार अपनी इस अबोध बिटिया पर विश्वास करके तो देख लेती…
ना… कैसे सुनती… वक्त कहाँ था तेरे पास मेरी सुनने को… वक्त कहाँ था तेरे पास 9 से 5 के अपने आफिस जाॅब से… वक्त कहाँ था तेरे पास छुट्टियों में अपने आॅफिस फ्रेंड्स व क्लब मीटिंग / पार्टियों से… वक्त कहाँ था तुझे दूसरे के घरों में झांकने से, इधर – उधर की बेतुकी बातें करने से… वक्त कहाँ था तूझे अपने घर परिवार संवारने से, रोटियां गोल व कमरे साफ सुथरे करने से… क्या मैं तेरे उस घर का एक हिस्सा न थी…? क्या कभी तूझे अपने इस “खून से निर्मित ” गुड़िया को संवारकर उसके चेहरे के इक मुस्कान् देखने की ललक ना जगी थी…? हरदम हंसती, मुस्कुराती, खिलखिलाती चेहरों का दिन-ब-दिन इस तरह उतरना क्या तूझे न दिख रहा था… दिन-ब-दिन सबसे अलग-थलग रहना भी क्या तूझे न दिखा था…?
नहीं, हमें नहीं लगता… हमें नहीं लगता कि तुम इस उम्र में इतने अंधी हो गयी या तेरे सुनने की क्षमता में इतनी कमी आ गई… नहीं, कैसे विश्वास करूँ अब मैं कि तू वही मेरी माँ है…
गर्व होता था अपने दोस्तों को ये बतलाते हुए मुझे कि मैं मात्र 5 साल की उम्र में कैसे फर्राटेदार सड़कों पर साइकिल चलाना सिख गई और उसे सिखने के दौरान मुझे कहीं चोट तक न आई… मेरी छाती चौड़ी हो जाती अपने 100 प्रतिशत उपस्थिति व Ontime Classroom attend करने के कारण पुरस्कार पाते हुए… क्योंकि वो तुम थी जिसका हाथ मेरे सर पर था… मेरे बुखार वाली रात को तेरा न सोना व मेरे दर्द को अपने अंदर समेट लेना… देखा था माँ मैंने… देखा है तेरे उस निर्मल ह्रदय को…
तेरे अंदर के दुर्गा के रूप से भी काफी परिचित हूँ मैं माँ… मुझे आज भी बखूबी याद है कि कैसे मेरे द्वारा कुत्ते को कंकड़ मार देने पर उसका मुझपर झपटना व भौंकना और अपनी छाती से हमें लगा उस कुत्ते के आगे डटकर खड़ा हो जाना… देखा है माँ मैंने… तू इतनी कमजोर भी नहीं …
हमें आप पर, पापा पर, परिवार पर और पुरे समाज पर कितना भरोसा था… और आखिर भरोसा हो भी क्यों ना… हाँ…
जब आप सब हमें इस खुले आसमान में उछालते तो कैसे खिलखिला हंसती थी मैं… डर जैसा मेरे मन में कोई भाव ही न था… क्योंकि जान गए थे हम कि वो आप सब हो जो हमें गिरने से पहले ही थाम लोगें… हमें पुरा भरोसा था कि वो आपसब हो जिसकी वजह से हम सुरक्षित है और वही वो भरोसा था जो वजह थी मेरे हंसने की, खिलखिलाने की, अपनों से लिपट जाने की…
और अब… अब तूझे क्या हुआ…? कहाँ गयी तेरे अंदर की वो ममतामयी निर्मल हृदय, तेरा वो फौलादी दुर्गा जैसा वो अटल रूप, कहाँ गयी वो मेरी कर्तव्यपरायणी माँ…?
आखिर अब तुम चुप क्यूं हो … हतास क्यूं हो… क्यों…? क्योंकि वो अपना सगा “मामा, काका, चाचा, ताऊ, चाची, भाई, बाप” है…
“अपना”… कितना अच्छा अपने लिए उस कंस ने संज्ञा ढूंढ रखा है… एकदम से सुरक्षित । लेकिन क्या, तू अब भी उस “अपने कंस” व “अपने” घर की मान मर्यादा को बचाने के लिए अपने इस “खून से निर्मित” गुड़िया का बलि ही देती रहोगी…? क्या मैं इस घर की कोई मान मर्यादा नहीं हूँ…? बोलो… अब तक तो तुम चुप ही थी… क्या अब भी मेरे लिए कुछ न बोलोगी… क्या अब भी तुम चुप ही रहोगी…? हम भी तेरे अपने ही है ना… गुनाह तो उस “अपने” ने किया है फिर हमसे क्यूँ मुह मोड़ रही हो । और हाँ, एक बात और कहूँ – उस निर्मम और क्रूर समाज का हिस्सा होने के नाते गुनाहगार तो तुम भी कुछ कम न हो माँ …
खैर छोड़ो… तेरे जैसे कुछेक स्त्री के अपने सगी – सम्बन्धियों के आगे झुक जाने, कमजोर हो जाने के चलते मैं पुरे स्त्री समुदाय को एक “कमजोर” की संज्ञा से कलंकित नहीं होने दुंगी… तेरे इस निष्ठुर गुमनाम में मैं अब खुद को एक गुमशुदगी की जिंदगी ना जिऊंगी… मैं लड़ूंगी … हाँ, मैं लड़ूंगी अपने लिए… अपने जैसे हर उस एक के लिए जिसे अपनों ने ही ठगा हो, जिनका बचपन उनके अपनों ने ही उनसे छिन लिया हो… जिनका भरोसा उनके अपनों ने ही तोड़ दिया है… हाँ, मैं लड़ूंगी बिना रूके, बिना किसी की सुनें… अपने हर उस एक के लिए जो मुझे अपना मानता हो … सम्मान देता हो… अपने स्वतंत्र, संघर्ष पूर्ण जीवन में स्थान देता हो… हाँ, हमें लड़ना होगा अब खूद ही… लड़ूंगी मैं… लड़ूंगी…

Leave a Reply

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.