Roshni by Akriti

देख कर जब एक बच्चे को मैले-कुचले कपड़ों मे,
सोच ले जाती न जाने किस अंधेरे मे |
जिसके गहराई से समाज अब भी दूर है ||
हुआ उजाला तो न जाने कितने दिए टूट चुके थे,
आररे भैया, ज़रा रुको, ठहरो, दिये का क्या है? वो तो अंधेरे मे जलकर बुझ भी जाता है ,
कोई तेज़ हवा का झोंका उसे उड़ा ले जाता है |
ज़रूर कोई बहरूपिया हवा होगा जिससे वो दिया बिन जले ही टूट गया ||
माथे पे शिकन और चेहरे पर मानो पसीने की बौछार पड़ी हो जैसे |||
अब ?
बिन कफन के दफन और न कोई जतन,
अब तो उजाला होने को आया |
(सवेरा तो होना ही था हर रोज की तरह मगर यह सवेरा कुछ अलग था एक इन्सानियत के लिए)
उस सवेरे की रोशनी कहीं दिख नहीं रही थी |
आररे हाँ, रोशनी ||
मेरी बेटी रोशनी, कहाँ गई वो ? पीछले रात से आँखें तरस गई उसे देखने को ,
बहुत ढूंढा पर वो न मिली |
किया सबसे सवाल और जवाब मे मिला “ना” ||
वो ना शब्द सुन न सकी और कहा रोशनी नहीं तो होसला भी नहीं |||

हिम्मत जुटाते-जुटाते देर तो हो चुकी थी,
आज फिर खामोशी और गुस्से ने एक इंसान को फिर मार डाला |
ऐसे न जाने कितने कत्ल देखने के बाद भी वो बहरूपिया हवा आज भी चलता रहता है ||
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नाम ढूँढने से जरूरी उन बहरूपियों को ढूँढना पहला और एक मात्र कदम |

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